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गुरुवार, 30 जुलाई 2020

अगर बच्चे अपने बुजुर्गों को पालने से इनकार तो बुजुर्ग माता - पिता के कानूनी अधिकार ।

अगर बच्चे अपने बुजुर्गों को पालने से मना करते हैं तो बुजुर्ग माता - पिता के पास कानूनी अधिकार है कि वह इसके बारे में कोर्ट में याचिका दायर करें। उसके बाद मैजिस्ट्रेट देखता है की अगर उसके बेटे या बेटी अपने बुजुर्ग माता-पिता को पालने में सक्षम होने और पर्याप्त आर्थिक संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद कोई व्यक्ति अगर अपने पेरेंट्स की देखभाल से मना करता है , तो मजिस्ट्रेट को ये अधिकार है कि उस व्यक्ति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दें सकती हे ।अगर आदेश का पालन नहीं होता तो मजिस्ट्रेट उसे सज़ा भी दे सकते हैं । 


ये सज़ा तीन महीने की जेल , या पांच हजार का जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं .कई बार ऐसे मामले भी देखने में आते हैं जहां लोग अपने घर के बुजुर्गों को कहीं बाहर छोड़ आते हैं , क्योंकि वो उनकी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते। लेकिन भारत का कानून इस मामले में बुजुर्ग नागरिकों को भारत के संविधान कई अधिकार देता है । लेकिन अधिकारों से पहले भारत का संविधान इसके बारे में क्या कहता है ।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए संविधान क्या कहता है ?

वरिष्ठ नागरिक या सीनियर सिटीजन वह है जो 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं । भारत के संविधान में भाग 4 में  डायरेक्टर प्रिंसिपल ऑफ स्टेट पॉलिसी राज्य के नीति निर्देशक तत्व आते हैं । इसके अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य अपने आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर ऐसे प्रावधान बनाए जो बेरोजगारी , वृद्धावस्था , बीमारी , और विकलांगता के मामलों में लोगों की मदद कर सकें । उन्हें नौकरी , पढ़ाई , और पब्लिक मदद आसानी से मिल सके , ऐसा उपाय किया जाए । चूंकि ये नीति निर्देशक तत्व हैं इसलिए इनकी अवहेलना को किसी अदालत में चैलेंज नहीं किया जा सकता । लेकिन ये बताते हैं कि राज्य यानी स्टेट की जिम्मेदारियां क्या हैं , जो उसे पूरी करनी चाहिए और किसी भी नीति बनाते समय ये ध्यान रखना चाहिए कि वो इन डिरेक्टिव प्रिंसिपल्स का पालन  करे ।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए कानून क्या कहता है ?

  क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ( CrPC ) 1973 के सेक्शन 125 के अनुसार पत्नी , बच्चों और पेरेंट्स की जिम्मेदारी उठाना एक बालिग़ और सक्षम व्यक्ति की जिम्मेदारी है ।

भारत सरकार की नेशनल पॉलिसी फॉर ओल्डर पर्सन्स 1999 के तहत वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई प्रावधान बनाए गए हैं । जैसे ट्रेन के टिकटों में 30 फीसद छूट , वहीं अगर वरिष्ठ नागरिक महिला हो , तो ये छूट 50 फीसद हो जाती ।

इस पॉलिसी के अनुसार एयर इंडिया को भी वरिष्ठ नागरिकों को इकॉनमी क्लास में सीट बुक करते समय 50 फीसद की छूट देनी है । उन्हें बोर्डिंग और डीबोर्डिंग के दौरान भी प्रायोरिटी पर रखा जाए ।

इनकम टैक्स के सेक्शन 88 बी , 88 डी , और 88 डीडीबी के तहत वरिष्ठ नागरिकों को टैक्स में छूट मिलने का प्रावधान है .

सीनियर सिटीजन की कैटेगरी में आने वाले नागरिक ( 60 से 80 वर्ष की उम्र वाले ) तीन लाख रुपए सालाना तक अगर कमाते हैं , तो ये पूरी तरह टैक्स फ्री होगा . वहीं सुपर सीनियर सिटिज़न ( 80 वर्ष और ऊपर ) के लिए ये लिमिट सालाना पांच लाख है .

वरिष्ठ नागरिकों के संबंध में परिवार के लिए क्या नियम हैं ?

मेंटेनेस एंड वेलफेयर और पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के मुताबिक़ कोई भी ऐसा वरिष्ठ नागरिक जो अपनी कमाई से अपनी देखभाल करने में सक्षम न हो , उसकी मदद करना उसके परिवार ( बेटा , बेटी , बहू , दामाद , पोते , पोती ) का फर्ज है ।

इस एक्ट के तहत रिश्तेदारों को भी कवर किया गया है . यहां रिश्तेदार का अर्थ उस व्यक्ति से है जो किसी भी वरिष्ठ नागरिक की मृत्यु के बाद उनकी चल / अचल संपत्ति का वारिस होगा .

अगर किसी भी वरिष्ठ नागरिक के बच्चे / बहू / दामाद उनकी देखभाल करने में अक्षम रहते हैं , तो इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है । और उनसे मेंटेनेंस ( गुजारा भत्ता ) की मांग की जा सकती है । इसकी लिमिट दस हज़ार महीना तय की गई है ।

इस एक्ट के तहत एक प्रावधान और है ।अगर किसी सीनियर सिटिज़न ने अपनी संपत्ति ( चल - अचल दोनों जैसे कैश या घर - जायदाद ) अपने बच्चे / बच्चों के नाम की है , इस शर्त के साथ कि उनका वारिस उनकी देखभाल करेगा और उनकी ज़रूरतें पूरी करेगा । लेकिन वो ऐसा नहीं करता और ये बात कोर्ट में साबित हो जाती है , तो ये ट्रांसफर फ्रॉड माना जाएगा और इसे रद्द कर दिया जाएगा । यही नहीं , वरिष्ठ नागरिक को ये अधिकार होगा कि वो दी गई प्रॉपर्टी / कैश वारिस से वापस ले सकते है ।

इन सभी मामलों का निपटारा करने के लिए ट्रिब्यूनल बनाने का प्रावधान किया गया है । ये ट्रिब्यूनल शिकायत आने पर या स्वतः संज्ञान लेकर भी किसी मामले का निपटारा कर सकते हैं । एक्ट ये कहता है कि संबंधित पार्टी को नोटिस दिए जाने के बाद अधिकतम 90 दिनों के भीतर मामले का निपटारा कर दिया जाना चाहिए ।

हिंदू पर्सनल लॉ के हिन्दू एडॉप्शन एंड मेंटेनेस एक्ट 1956 के तहत सेक्शन 20 में भी इस से जुड़ी जानकारी दी गई है ।इसमें भी जो वरिष्ठ नागरिक अपनी देखभाल करने आर्थिक / शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं , उनकी देखभाल करना उनके बेटे - बेटी की ज़िम्मेदारी है ।


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